रविवार, 3 मई 2015

जब सावन सो जाता है .....

जब सावन सो जाता है
मधुवन को रोना पड़ता है -
जब हाथों से औज़ार गए
तब भूखा सोना पड़ता है -
रत कालजयी कर्तव्यों में
अपनों को खोना पड़ता है -
फूलों की चाहत में मितरा
काँटों को सहना पड़ता है -
विष की दवा विष ही होती
संग विष को ढोना पड़ता है -
दर्शन विहीन मानस को
मिथकों में जीना पड़ता है -
-उदय वीर सिंह

5 टिप्‍पणियां:

Onkar ने कहा…

सुन्दर और सटीक रचना

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (04-05-2015) को "बेटियों को सुशिक्षित करो" (चर्चा अंक-1965) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
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Sanju ने कहा…

सुन्दर व सार्थक प्रस्तुति..
शुभकामनाएँ।
मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

jyoti khare ने कहा…

बेहद उम्दा प्रस्तुति
बधाई

कालीपद "प्रसाद" ने कहा…

सुन्दर !