सोमवार, 18 अप्रैल 2016

टुटे हुए शाहिल का.....

टुटे हुए शाहिल का शजर हो गया हूँ
अपनी गुमनामी की खबर हो गया हूँ -

अपनों ने रक्खा मुझे पलकों की छांव में
अपनों के हाथों दर- बदर हो गया हूँ -

जिंदगी की शाम में अब सहरा की रेत है ,
अनजानी मंजिल का सफर हो गया हूँ -

उदय वीर सिंह


1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (19-04-2016) को "दिन गरमी के आ गए" (चर्चा अंक-2317) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'