सोमवार, 19 नवंबर 2012

यथार्थ के धरातल ...


झिलमिल! झिलमिल !

ले स्वर्ण रश्मियों  के तार 
अभिसरित हो रहा
प्रभात !
बुन रहा है ,व्योम सुन्दर ,
दे चक्षुओं की तूलिका  .....
सृजित कर नव  दृश्य ,
कोई गीतिका आकार ले
विथियाँ  प्रलेख हों ,दे सकें गंतव्य को 
सुरम्यता की गोंद में,
यश, समृद्धियाँ मिले ,
स्वप्न देखे जाएँ ,
यथार्थ के धरातल 
संकल्पित हो मानस 
स्वप्न ,मनुष्यता के 
साकार  हों  .....
सहकारिता  विस्तार ले ....

                             - उदय वीर सिंह





7 टिप्‍पणियां:

रविकर ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति |
आभार -

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सोने जैसा शुभ्र सबेरा..

Rohitas ghorela ने कहा…

sundar abhivykti...

Rajesh Kumari ने कहा…

आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार 20/11/12 को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका स्वागत है

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

उम्दा भावलिए सुंदर प्रस्तुति,,,

recent post...: अपने साये में जीने दो.

Madan Mohan Saxena ने कहा…

पोस्ट दिल को छू गयी.......कितने खुबसूरत जज्बात डाल दिए हैं आपने..........बहुत खूब
बेह्तरीन अभिव्यक्ति .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

Madan Mohan Saxena ने कहा…

पोस्ट दिल को छू गयी.......कितने खुबसूरत जज्बात डाल दिए हैं आपने..........बहुत खूब
बेह्तरीन अभिव्यक्ति .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.