शनिवार, 3 नवंबर 2012

अल्फाज हो खुदा के ...















कदम   हलचल मचाते  हैं
जब     अपने    बुलाते  हैं
नसीहत   भूल    जाती  है ,
घर    काँटों    के  जाते  हैं -


न   इलहाम   की   दौलत ,
नहीं  आलिम के घर से हैं ,
तेरी खुशबू    के कायल हैं ,
हम   तेरे,  पास   आते  हैं-

क्या रिश्ता है नहीं मालूम ,
नूरानी     खुबसूरत     हो,
हवा     देती    तेरी  आहट
दीवाने      झूम    जाते  हैं-


तेरी  बाँहों  में खुशियाँ  है
तेरे  आँगन  में जन्नत है ,
इलाही   पाक   दामन  में
हम  आकर  भूल जाते हैं-



अल्फाज    हो   खुदा   के ,
सूरत      मुहब्बत       के ,
पैगाम    हो      अमन  के
मसीहा   तुमको  बुलाते हैं -

हो   दुनियां  में राज  तेरा 
हम  सिजदे   में   कहते हैं ,
तुम्हारी  चाहतों में शायद 
खुदा    दुनियां    बनाते हैं -

               -- उदय वीर सिंह 






5 टिप्‍पणियां:

Manu Tyagi ने कहा…

सुंदर रचना

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आज 03 - 11 -12 को आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है .....

.... आज की वार्ता में ... चलो अपनी कुटिया जगमगाएँ .ब्लॉग 4 वार्ता ... संगीता स्वरूप.

expression ने कहा…

बहुत अच्छी रचना....

न इलहाम की दौलत ,
नहीं आलिम के घर से हैं ,
तेरी खुशबू के कायल हैं ,
हम तेरे, पास आते हैं-

लाजवाब....
अनु

dheerendra bhadauriya ने कहा…

तेरी बाँहों में खुशियाँ है
तेरे आँगन में जन्नत है ,
इलाही पाक दामन में
हम आकर भूल जाते हैं-

बहुत खूब उत्कृष्ट प्रस्तुति के लिये बधाई,,,,

RECENT POST : समय की पुकार है,

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

शान्ति और समृद्धि हर ओर फैले..यही सबकी चाह हो।