सोमवार, 27 जून 2016

महामना की श्रेणी

महामना की श्रेणी [ तथ्यांश ]
आजादी के बाद हम अधार्मिक हो गए थे ,अब धार्मिक हो रहे हैं हम अपनी परंपरा रीति रिवाज कर्मकांड संहिताए विधर्मियों के दबाव से भूल गए थे ,अब याद आ रहे हैं क्यों की उर्वरा मिट्टी व वातावरण अनुकूलन में है हमारा ज्ञान पुनः सुशु प्ता अवस्था को तज जाग्रत अवस्था में आ चुका है । अवसर मिल रहा है पुनर्निमान का,खोई हुई अस्मिता को स्थापित करने का संकल्प लें । संगोष्ठी में महामना जी उत्साहित हो बोल रहे थे ।
इतिहास अपने को दुहराता है यह दिखता प्रतीत होता है । स्मृतियों भाष्यों कथानकों में वर्णित मूल्यों का उन्नयन होना अपरिहार्य है ,उन आचार संहिताओं का ही समाज व हृदय में संग्यान लेना होगा । कितने पिछड़ गए थे उनसे बिछड़ कर ,कितनी धन जन व ज्ञान की हानि हुई ,अनुमान लगा नहीं सकते । आधुनिक नियम उपनियम संवेदनाए प्राचीन गौरव से विस्थापित हुई लगती हैं स्थापित करना होगा । सबका विकास होना है संवर्धन होना है उनके सद्द स्थापित प्रकोष्ठों में । उनमें बिचलन से ही हमारे समाज संस्कृति को अधोगति प्राप्त हुई है ।पिछली सताब्दियों में विधर्मियों के साथ ही कुछ हमारे तथाकथित ऋषि संत गुरु आस्था परोपकार की आड़ में समाज को दिग्गभ्रमित किया है नए पंथ संप्रदायों का निर्माण कर मनुष्य मात्र को मूल पथ से विमुख किया है , यह अच्छा नहीं है स्वीकार्य नहीं है । उनका परित्याग करना होगा ।
महामना आप का तात्पर्य हमें फिर से ब्राह्मण-ब्राह्मण ,क्षत्रिय -क्षत्रिय ,वैश्य -वैश्य ,शूद्र-शूद्र खेलना होगा । भीड़ से कालभद्र जी ने अपनी शंका निवारण हेतु खड़े हो पूछा ।
   आप समझदार हैं अनुकूलन में रहें बैठ जाएँ महामना ने बैठने का इशारा किया ।
महामना सारा विश्व एक दूसरे से विज्ञान की युक्तियों द्वारा एकीकृत हो गया है, संचार संस्कृति ज्ञान आचार आध्यात्मिक ,भौतिक विधाएँ साझा हो रही हैं । हम भी अपनी सहभागिता दर्ज कर रहे हैं । उच्चतम मूल्यों को स्वीकार करने की बहस छिडी हुई है । हम अपने को कहाँ पा रहे हैं । अन्वेषकदेव जी की  कुतूहल भरी जिज्ञाशा उद्वेलित हुई ।
   आप अभी शुषुप्तावस्था में है जाग्रत हों । बैठने का इशारा किया महामना जी ने ।
हमें अपनी ज्ञान, विज्ञान, प्रगति ,विचारधारा, बिसंगति,पारदर्शिता प्रेम, दर्शन से विश्व पटल पर किस श्रेणी में खेलना होगा ?समाज का वर्गिकरण होगा तो देश भी होंगे यही तो तर्क संगत है, उचित भी । शंकाधि जी ने प्रश्न किया ?
आप शंकाधि जी नहीं, व्याधि जी लगते हैं , बैठ जाईये आप के पास और कोई प्रश्न या शंका नहीं है क्या ? झल्लाते हुये महामना जी ने आँकें तरेरी ।
   प्रश्न वाजिब था गोष्ठी में चेहरे एक दूसरे को प्रश्नोचित दृष्टि से देख रहे थे ।
सर्व- धर्म सम-भाव की गोष्ठी में उथल पुथल थी। कुछ लोग ही रह गए थे।शनैः शनैः लोग चलते गए बिना यथेष्ट निर्णय के ।
महामना का नियोजित  प्रस्ताव निष्प्रभावी हो गया था । समाज के साथ देशों की भी श्रेणी विभक्ति सार्थक प्रश्न लगता है ..... । महामना ध्यान में अपने गालों पर उँगलियाँ लगाए डूब से गए थे । 

उदय वीर सिंह

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (28-06-2016) को "भूत, वर्तमान और भविष्य" (चर्चा अंक-2386) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'