शनिवार, 13 अगस्त 2016

शब्द बड़े हो गए पीड़ा से ....

शब्द बड़े हो गए 
पीड़ा से 
प्रलाप बड़ा हो गया 
विचार से 
रात बड़ी हो गई
नींद से 
स्वप्न बड़े हो गए 
व्योम से 
अभिलाषा बड़ी हो गई 
बसुधा से 
निराशा बड़ी हो गई 
आशा से 
परीभाषा बड़ी हो गई 
यथार्थ से 
स्वार्थ बड़ा हो गया 
परमार्थ से 
तरु बड़े हो गए 
बीज से -
बीज रह गया 
समाधिस्थ होने को 
नवल तरु 
निहितार्थ मौन होकर ......
उदय वीर सिंह



2 टिप्‍पणियां:

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 14 अगस्त 2016 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (15-08-2016) को "तिरंगे को सलामी" (चर्चा अंक-2435) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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आप सबको स्वतन्त्रता दिवस की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'